मैं ग़ालिबों जैसा था कभी मीरों की तरह था
मेरा कहा पत्थर पे लकीरों की तरह था ,

मजनूँ ने तावीज़ – ए – मोहब्बत लिये मुझसे
मैं आशिकों के दरमियाँ पीरों की तरह था ,

वो तख़्त-नशीं जब भी हुआ मैंने गिराया
वो बादशाह था मैं भी फ़क़ीरों की तरह था ,

~ #AamirAmeer

साँस लेना भी कैसी आदत है

साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है…
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में…
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है…
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं…
आदतें भी अजीब होती हैं!!

मैं मुस्लिम हूँ, तू हिन्दू है, हैं दोनों इंसान,
ला मैं तेरी गीता पढ़ लूँ, तू पढ़ ले कुरान,
अपने तो दिल में है दोस्त, बस एक ही अरमान,
एक थाली में खाना खाये सारा हिन्दुस्तान।

#अज्ञात #hindumuslimbhaibhai